“अंधे की लकड़ी होना” (Andhe Ki Lakdi Hona Muhawara) हिन्दी व्याकरण में प्रसिद्धि प्राप्त मुहावरा है। इसका प्रयोग अक्सर आम बोलचाल में किया जाता रहता है। जब किसी व्यक्ति के आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और उनके पास केवल एक ही आप्शन शेष रहता है। आइए इस पोस्ट में इसका विस्तृत अध्ययन करेंगे।
“अंधे की लकड़ी होना” मुहावरे का अर्थ –
आजकल हर व्यक्ति रात-दिन अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए मेहनत करता है। काफी मेहनत करने के बावजूद सफलता नहीं मिल पाती तो वह अपनी सफलता प्राप्त करने के किसी को अन्तिम सहायक बनाकर लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करता है। इस अन्तिम सहायक को “अंधे की लकड़ी” कहा जाता है।
1. अमन की सफलता में उसके माता-पिता “अंधे की लकड़ी” के समान थे। अमन ने माता-पिता के सहयोग से अपनी सफलता प्राप्त की थी।
2. कृति बहुत अधिक बीमार थी। वह कुछ खा-पी नहीं सकती थी। अब केवल भगवान ही उसके लिए ‘अंधे की लकड़ी’ हो सकते हैं।
3. रोहन पढ़ाई में बहुत कमजोर था। उसकी दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने में विधाता ‘अंधे की लकड़ी’ हो गए और रोहन पास हो गया।
4. विजय के कैंसर की बीमारी हो गई। अब उसके जीवन बचाने के लिए एक एक्सीलेंट डाॅक्टर ही ‘अंधे की लकड़ी’ हो सकता है।
5. एक विद्यालय में अंग्रेजी का शिक्षक नहीं था। उनकी सफलता में ट्यूशन टीचर ही अंधे की लकड़ी बना।
6. मनोहर विदेश में रहता था। उससे मिलने वाला वहां कोई नहीं था। मोबाइल ही उसके लिए अंधे की लकड़ी का काम करता है।
7. पश्चिमी राजस्थान में पानी की अधिक समस्या है। वहां के लोगों के लिए टांके अंधे की लकड़ी के समान थे।
8. किसान के लिए खरीफ की फसल में अच्छी पैदावार के लिए बरसात अंधे की लकड़ी के समान होती है।
9. आग लगने से सूरदास के जीवनभर की कमाई जलकर खाक हो गई। अब तो उसके लिए भगवान ही अंधे की लकड़ी हो सकता है।
10. अबकी बार अधिक बरसात के किसान की सारी फसल गलकर नष्ट हो जाती है। किसान के सरकार ही अंधे की लकड़ी हो सकती है। और उनको मुआवजा मिल सकता है।
आपने एक प्राचीन घटना को पुस्तकों में पढ़ा होगा और दादी नानी की कहानी के माध्यम से सुना होगा। एक समय की बात है उस समय अयोध्या के राजा दशरथ हुआ करते थे। एक दिन राजा शिकार के लिए सरयू नदी के किनारे एक बैठ जाते हैं। और शिकार आने का इंतजार करते हैं कि कोई जानवर पानी पीने के लिए नदी पर अवश्य आयेगा।
उसी समय श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा पर चल रहे थे। उस दिन उनका पड़ाव सरयू नदी के पास ही था। श्रवण कुमार के माता-पिता को प्यास लगी तो वह सरयू नदी पर पानी लेने चला गया। जैसे ही श्रवण कुमार ने नदी में मटका डुबोया तो राजा दशरथ ने यह किसी जानवर की पानी पीने की आवाज समझकर बाण छोड़ दिया।
राजा दशरथ शब्द भेदी बाण चलाने में निपुण थे और उनका निशाना अचूक था। बाण सीधा ही श्रवण कुमार के सीने में लगा और हाय करके बेहोश हो गए। राजा ने नीचे उतर कर उससे सभी जानकारी ली। श्रवण कुमार ने सारी बात राजा को सुनाई और अपने प्राण त्याग दिए।
राजा दशरथ श्रवण कुमार के माता-पिता को पिता को पानी पिलाने गया। श्रवण कुमार के माता-पिता ने राजा दशरथ की आवाज को पहचान कर कहा कि आप श्रवण कुमार नहीं है इसलिए हम यह जल ग्रहण नहीं करेंगे।
श्रवण कुमार के माता-पिता को राजा ने उसकी मृत्यु के बारे में बताया तो उन्होंने विलाप करते करते अपने प्राण त्याग दिए। क्योंकि उनके लिए श्रवण कुमार ही अंधे की लकड़ी था। जो कांवड़ में बैठाकर उनकी यात्रा के लिए निकला था।
एक समय की बात है। विजय नाम का एक लड़का था। उनके माता-पिता बहुत गरीब थे। पिताजी ने विजय को मजदूरी करके पढ़ाया लिखाया। आगे चलकर उच्च शिक्षा के लिए शहर भेज दिया। शहर में जाकर विजय ने पढ़ाई में बहुत अधिक मेहनत की।
विजय रात-दिन कठोर परिश्रम करता। उसने कई परीक्षाओं में बैठने का मौका मिला लेकिन सफलता नहीं मिली। अबकी बार उसने अपनी मेहनत करने अपना तन-मन समर्पित कर दिया।
उसे पता था कि वह अपने माता-पिता की “अंधे की लकड़ी” था। विजय ही उनके बुढ़ापे सहारा था। विजय को इस बार सफलता प्राप्त हो जाती है और उसे अकाउंटेंट की नौकरी मिल जाती है। उसके माता-पिता बहुत प्रसन्न होते हैं।
एक बार की बात है। सुनीत और विनीत दो दोस्त थे। सुनीत एक धनी व्यापारी का बेटा था और विनीत एक गरीब बेसहारा मजदूर का बेटा था। वे दोनों बहुत ही घनिष्ठ मित्र थे। एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा काम आते थे। विनीत ने मिडिल क्लास तक शिक्षा गांव में ही प्राप्त कर ली थी।
अब आगे की शिक्षा लेने के लिए शहर जाना पड़ता था। विनीत के पिता मजदूरी करके पेट पालन करते इसलिए वे विनीत को शहर भेजने में सक्षम नहीं थे। सुनीत ने अपने पिता से विनीत के बारे में बताया तो उसके पिताजी ने कहा विनीत का समस्त शिक्षा का खर्चा वहन करने का वादा किया।
आगे चलकर विनीत को एक सरकारी नोकरी मिल जातीं हैं। लेकिन शिक्षा दिलाने में सुनीत “अंधे की लकड़ी” बनकर उसके जीवन में आया।
“अंधे की लकड़ी मुहावरे से हमें शिक्षा लेनी चाहिए। जिस प्रकार श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा की ठानी थी। श्रवण कुमार ने उनकी सेवा के लिए अपने जान की बाजी लगा दी थी।
हमें भी अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। बुढ़ापे में उनका सहारा बनना चाहिए। वृद्धावस्था में हमें उनके लिए अंधे की लकड़ी बनकर हरसमय सेवा करनी चाहिए।
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धन्यवाद
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